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अगस्त के आयर्वेदिक गुण एवं सेवन विधि – August Health Benefits Home Treatments in Hindi

हिंदी नाम : अगस्तिया, अगस्त

English : Sesbane
संस्कृत    : अगस्त्य, मुनिद्रुम
गुजराती  : ઓગસ્ટ, अगथियो
मराठी     : अगसे गिड़ा
बंगाली    : অগাস্ট, वक
पंजाबी    : ਅਗਸਤ, हथिया
तेलगु      : ఆగస్టు, अविषि
तमिल    : ஆகஸ்ட், अगति
उर्दू         : اگست
अरबी    : أغسطس

अगस्त का परिचय: 

अगस्त के रोपे हुए वृक्ष सर्वत्र मिलते हैं। जंहा जल की प्रचुरता तथा वायु मंडल उष्ण प्रधानशील है, वहां खूब फलता फूलता है। वर्षा ऋतु में इसके बीज उगते है। राजनिघन्टुकार ने इसकी चार जातियां श्वेत, पीत, नील ओर रक्त बतलाई है। परन्तु अधिकांश रूप में श्वेत रंग का पुष्प ही प्राप्त होता है। इसके कोमल पत्र, पुष्प और फलियों का शाक बनाकर खाया जाता है। अगस्त का आयर्वेदिक गुण एवं सेवन विधि – August Health Benefits Home Treatments in Hindi as under:

अगस्त का बाह्य-स्वरूप

अगस्त के वृक्ष अल्पायु तथा शीघ्र वर्धनशील, 20 फुट तक ऊँचे होते हैं। पत्र संयुक्त बहुत लम्बे पत्र दंड पर 25-30 जोड़ों में लगते हैं। पत्रक एक से डेढ़ इंच तक लम्बे किंचित अंडाकार, पुष्प श्वेत वर्ण, नौकाकार, शिम्बी एक फुट लम्बी किंचित व्रक, चपटी और प्रत्येक फली में 15-20 हल्के रंग के बीज होते हैं। शरद ऋतू में पुष्प तथा शीतकाल में फल लगते हैं।

रासायनिक संघटन

अगस्त छाल में टैनिन और रक्तवर्ण का निर्यास होता है। पत्तियों में प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा तथा विटामिन ए, बी, सी, पुष्प में विटामिन बी सी तथा प्रोटीन, बीजों में लगभग 70 प्रतिशत प्रोटीन तथा एक तेल पाया जाता है।

गुण-धर्म

पुष्प की उपयोगिकता

अगस्त पित्त, कफ तथा चातुर्थिक ज्वरनाशक, शीतल, रुक्ष, तिक्त, वातकर तथा प्रतिश्याय का निवारण करने वाला है। शीतवीर्य, मधुर, कड़वा, कसैला, विपाक में चरपरा तथा त्रिदोष पिंजरी चातुर्थिक ज्वर, रतौंधी, पीनस रोग और वातरक्त नाशक है।

पत्र की उपयोगिकता

अगस्त कटु, तिक्त, किंचित उष्ण, विपाक में मधुर, गुरु तथा कृमि कफ, कण्डू, रक्त पित्त, विष तथा प्रतिश्याय को दूर करने वाला है।

शिम्बी की उपयोगिकता

अगस्त फली विपाक में मधुर, तिक्त लघु, सर, दस्तावर, रुचिकारक, बुद्धिदायक, स्मरणशक्ति वर्धक तथा त्रिदोष शूल, पाण्डु, विष, शोथ और गुल्म-नाशक है। पककफली रुक्ष और पित्तकारक होती है। इसकी छाल संकोचक, कटुपोष्टिक, पाचक और शक्ति-वर्धक है।

औषधीय प्रयोग

मिर्गी में अगस्त की वैदिक दवाएं

1. अगस्त के पत्तों का चूर्ण और काली मिर्च का चूर्ण समान भाग में लेकर गोमूत्र के साथ बारीक पीसकर मिर्गी के रोगी को सुंघाने से लाभ होता है।

2. यदि बालक छोटा हो तो इसके दो पत्तों का रस और उसमें आधी मात्रा में काली मिर्च मिलाकर उसमें रुई का फोया तरकर उसे नासारन्ध के पास रखने से ही अपस्मार शांत हो जाता है।

आधाशीशी में अगस्त की वैदिक दवाएं

जिस तरफ के मस्तिष्क में वेदना हो इसके दूसरी ओर के नथुने में अगस्त के पत्तों या फूलों के रस की 2-3 बूंदे टपकाने से तुरंत लाभ होता है। इससे नासिका की पीड़ा भी शांत हो जाती है।

प्रतिश्याय में अगस्त की वैदिक दवाएं

जुकाम के वेग से सिर बहुत भारी तथा दुःखता  हो तो अगस्त पत्र रस की दो -चार बूंदे नाक में टपकाने से तथा इसकी मूल का रस 10 से 20 ग्राम तक शहद मिलाकर दिन में 3-4 बार चाटने से कष्ट दूर हो जाता है।

नेत्र विकार में अगस्त की वैदिक दवाएं 

1. इसके पुष्पों का रस 2-2 बूंद नेत्रों में डालने से दृष्टि का धुंधलापन मिटता है।

2. इसके पुष्पों की सब्जी या शाक बनाकर सुबह-शाम खाने से रतौंधी मिटती है।

3. इसके 250 ग्राम पत्रों को पीसकर एक किलोग्राम गोघृत में पकाकर सिद्ध किये हुए घी को 5-10 ग्राम सुबह-शाम सेवन करने से परम् लाभ होता है।

4. इसके पुष्पों का मधु आँखों में डालने से धुंध या जाला मिटता है। पुष्प को तोड़ने से भीतर से 2-3 बून्द मधु निकलता है।

5. इसके पत्तों को घी में भूनकर खाने से और घी का सेवन करने से दृष्टिमांध, धुंध या जाला कटता है।

चित्तविभर्म में अगस्त की वैदिक दवाएं

इसके पत्र रस में सौंठ, पीपर और गुड़ समभाग मिलाकर 1-2 दो बून्द नस्य देने से लाभ होता है।

स्वर भंग में अगस्त की वैदिक दवाएं

अगस्त पत्तियों के क्वाथ से गण्डूष करने से शुष्क कास, जीभ का फटना, स्वरभंग तथा कफ के साथ रुधिर निकलने में लाभ होता है।

 

उदरशूल में अगस्त की वैदिक दवाएं

अगस्त की छाल के 20 ग्राम क्वाथ में थोड़ा सैंधा नमक और भूनी हुई 20 नग लौंग मिलाकर सुबह- शाम पीने से तीन दिन में पुराने उदर विकार और शूल नष्ट हो जाते है।

बद्धकोष्ठ में अगस्त की वैदिक दवाएं

अगस्त 20 ग्राम पत्तों को 400 ग्राम पानी में उबालकर, 100 ग्राम शेष रहने पर 10-20 ग्राम क्वाथ पिलाने से बद्धकोष्ठ मिटता है।

श्वेत प्रदर में अगस्त की वैदिक दवाएं

अगस्त की ताजी छाल को कूटकर इसके रस में कपड़े को भिगो कर योनि में रखने से श्वेत प्रदर और खुजली में लाभ होता है।

गठिया में अगस्त की वैदिक दवाएं

धतूरे की जड़ और अगस्त की जड़ दोनों को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें और पुल्टिस जैसा बनाकर वेदनायुक्त भाग पर बाँधने से कष्ट दूर होता है। सूजन उत्तर जाती है। आईएम वेदना में लाल अगस्त की जड़ को पीसकर लेप करें।

वातरक्त में अगस्त की वैदिक दवाएं

अगस्त के सूखे पुष्पों का 100 ग्राम महीन चूर्ण भैस के एक किलो दूध में डालकर दही जमा दें, दुलर दिन मक्खन निकल कर मालिश करें। इस मक्खन की मालिश खाज पर करने से भी लाभ होता है।

बुद्धिवर्धनार्थ में अगस्त की वैदिक दवाएं

अगस्त के बीजों का चूर्ण 3 से 10 ग्राम तक गाय के धारोष्ण 250 ग्राम दूध के साथ प्रातः-सांय कुछ दिन तक खाने से स्मरण शक्ति तीव्र हो जाती है।

ज्वर में अगस्त की वैदिक दवाएं

1. अगस्त के फूलों या पत्तों का रस सुँघाने से चातुर्थिक ज्वर और बंधे हुए जुकाम में लाभ होता है।

2. अगस्त पत्र स्वरस की दो या तीन चम्मच में आधा चम्मच शहद मिलाकर प्रातः-सांय सेवन करने से शीघ्र ही चातुर्थिक ज्वर का आना रुक जाता है। इसका प्रयोग बराबर 15 दिन तक करना चाहिए।

3. फेफड़ों के शोथ एवं कफज कास श्वास के साथ यदि ज्वर हो तो इसकी जड़ की छाल अथवा पत्तों का या पंचाग का 10 या 20 ग्राम स्वरस में बराबर शहद मिलाकर दिन में 2 से 3 बार सेवन करने से अत्यंत लाभ होता है।

4. इसकी जड़ की छाल के 2 ग्राम महीन चूर्ण को पान के पत्तों के 10 ग्राम रस के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से भी कफज कास श्वास के साथ ज्वर में लाभ होता है।

5. मसूरिका के और दूसरे ऐसे ज्वरों में जिनमें फोड़े-फुंसियां हो जाया करती है, छाल का हिम या फांट 20 से 30 ग्राम की मात्रा में सबुह-शाम खाली पेट पिलाना चाहिए।

मूर्च्छा में अगस्त की वैदिक दवाएं

अगस्त केवल पत्र रस की चार बूंदे नाक में टपका देने से ही मूर्च्छा दूर हो जाते है।

बच्चों के विकार में अगस्त की वैदिक दवाएं

अगस्त के पत्र स्वरस को लगभग 5 से 10 ग्राम की मात्रा में पिलाने से दो -चार दस्त होकर बच्चों के सब विकार शांत हो जाते हैं।

अन्तर्विद्रधि में अगस्त की वैदिक दवाएं

अगस्त के पत्रों को गर्म कर यदि पुटपाक विधि से गर्म करें तो अच्छा है, फोड़े के स्थान पर बाँधने से अन्तर्विद्रधि फूट कर बह जाती है।

रक्तस्राव में अगस्त की वैदिक दवाएं

इसके फूलों का शाक खाने से लाभ होता है।

Subject- August ka Aurvedik Prayog evam Sevan Vidhi, August ke Phayde, August ki Vaidik Dvayen, August se Labh.

August ki Chikitsiy Upyog evam Sevan Vidhi.

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