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ALSI-अलसी के औषधीय गुण लाभ सेवन विधि – Flax Seeds Treatment & Health Benefits in Hindi

अलसी का परिचय – Flax Seeds Introduction

ALSI-अलसी के औषधीय गुण लाभ सेवन विधि: समस्त भारतवर्ष में अलसी की खेती जाड़े की फसल के साथ की जाती है। हिमाचल प्रदेश में भी 6.000 फुट की ऊंचाई तक तीसी बोई जाती है। देश एवं उत्पत्ति स्थान भेद से तीसी के बीजों के रंग रूप और आकर में भेद पाया जाता है। श्वेत, पीत, रक्त एवं किंचित कृष्णाभ, तीसी के कई प्रकार के बीज प्राप्त होते है। उष्ण प्रदेशों में उत्पन्न तीसी श्रेष्ठ मानी जाती है। इसके बीजों से तेल और डंठलों से फाइबर निकाला जाता है, जो कपड़ा बुनने के काम आता है।

बाह्य -स्वरूप

इसका क्षुप, 2-4 फुट ऊँचा, सीधा व कोमल होता है। पत्र रेखाकार, भालाकार, पत्राग्र नुकीला व फलक तीन शिराओं से युक्त होता है। फूल सुंदर आसमानी रंग के, फल गोल, घुंडीदार, पंचकोष्ठीय, प्रत्येक कोष्ठ में चमकीले चपटे गाढ़े भूरे रंग के 2 बीज होता हैं। शीतकाल में पुष्प और फल लगते है। फरवरी -मार्च में फल सूख जाते है।

रासायनिक संघठन

तीसी के बीजों में एक स्थिर तेल पाया जाता है। तेल में प्रधानतः लिनोलिक तथा लिरोलेनिक एसिड्स के ग्लिसराइडस तथा गहन वसाम्ल होते हैं। बीजों में एक विषाक्त ग्लूकोसाइड पाया जाता है। जिसके कारन इसे खाने वाले पशुओं की मृत्यु हो जाती है। इसके अतिरिक्त इसके बीजों में प्रोटीन, म्यूसिलेज, कुछ मोमीय पदार्थ, रालीय पदार्थ, फास्फेट्स एवं शर्करा अंश पाये जाते हैं। इसकी राख में सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, लौह, फास्फोरस, गंधक आदि तत्व पाये जाते है।

गुण-धर्म Alsi

बीज मधुर, मंद गंध युक्त, स्निग्ध, उष्ण, चरपरी, गुरु, बलकारक, कामोद्दीपक,अल्प मात्रा में मूत्रकारक, शोथहर, अधिक मात्रा में रेचक, वातनाशक तथा वातरक्त, कुष्ठ, व्रण, पृष्ठशूल, शुक्र, कफ, पित्त है।

अलसी तेल -Flax Seeds Oil

अलसी तेल Alsi ka tel मधुर, पिच्छिल, वातनाशक, मदगंधी, कुछ कसैला, बलकारक, भारी, गर्म, मलकारक, स्निग्ध, ग्राही, कफ कासनाशक तथा त्वक दोष हर हैं।

अलसी पत्र 

कास श्वास, कफ वातनाशक, इसके ताजे हरे पत्तों की शाक या तरकारी वातग्रस्त रोगियों के लिए विशेष लाभदायक है।

अलसी पुष्प 

रक्त पित्तनाशक है

औषधीय प्रयोग

शिरोवेदना 

बीजों को शीतल जल में पीसकर लेप करने से शोथ जन्य शोरोवेदना, मस्तक पीड़ा तथा शिरोव्रण  में लाभ होता है।

निद्रा नाश 

अलसी तथा अरंड का शुद्ध तेल, समभाग मिलाकर कांसे की थाली में कांस्य पात्र से ही खूब घोंटकर आंख में सुरमे की तरह लगाने से नींद अच्छी आती है।

नेत्राभिष्यन्द 

अलसी बीजों का लुआब नेत्र में टपकाने से नेत्राभिष्यन्द या नेत्र की लालिमा में लाभ होता है।

कर्णशोथ 

अलसी को प्याज के रस में पकाकर उसे कान में टपकाने से कान की सूजन मिटती

श्वास कास 

1. 5 ग्राम अलसी के बीज, 50 ग्राम पानी में भिगोकर रखें, और 12 घंटे बाद जल पी लें। प्रातः काल भगोया हुआ सांयकाल और शाम को भिगोया हुआ सुबह को पी लें। इस जल के सेवन से श्वास-ग्रस्त रोगी को बहुत शक्ति मिलती है। परन्तु पथ्य परहेज का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए।

2. 5 ग्राम अलसी बीजों को कूट-छानकर जल में उबालें। इसमें 20 ग्राम मिश्री मिलकर, यदि शीतकाल हो तो मिश्री के स्थान पर शहद मिलायें। इस पेय के प्रातः -सांय सेवन करने से भी कास श्वास में लाभ होता है।

3. 3 ग्राम अलसी बीजों को मोटा कूटकर 250 ग्राम उबलते हुए जल में भिगो दें और एक घंटा ढक कर रख दें। तत्पश्चात छानकर थोड़ी शक्कर मिलकर सेवन करने से भी शुष्क कास ढीला श्वास रोग की घबराहट दूर होती है। मूत्र साफ़ होता है।

4. 25 ग्राम अलसी के बीजों को पीसकर रातभर ठन्डे जल में भिगोकर रखें, प्रातः काल छानकर इस जल को कुछ गर्म कर इसमें नीनू का रस मिलकर पिलाने से टी.बी. के रोगी को बहुत लाभ होता है।

5. अलसी के बीजों को भूनकर शहद के साथ चाटने से खांसी मिटती है।

6. अलसी को साफ़ कर मंद आंच से तवे पर भून लें। जब अच्छी तरह भून जाये, गंध आने लगे तब महीन समभाग मिश्री मिला लें। जुकाम में 5-5 ग्राम तक उष्ण जल के साथ दोनों समय देने से आराम होता है। कास का भी दमन होता है।

वातकफ जन्य विकार 

तवे पर भली-भांति भूनी हुई 50 ग्राम अलसी का चूर्ण बनाकर, उसमें 50 ग्राम मिश्री, 10 ग्राम मिर्च चूर्ण, मिलाकर मधु के साथ घोंटकर 3-6 ग्राम तक की गोलियां बना लें।  बच्चों को 3 ग्राम की तथा बड़ो को 6 ग्राम तक की गोलियां प्रातः काल सेवन कराने से वात कफजन्य विकारों में लाभ होता है। एक घंटा तक जल न पीयें।

प्लीहा -वृद्धि में अलसी का प्रयोग 

भूनी हुई अलसी ढाई ग्राम की मात्रा शहद के साथ लेने से प्लीहा शोथ में लाभ होता है।

रेचन में अलसी का प्रयोग 

तीसी को गर्म किये बिना, निकाला हुआ तेल 4-8 ग्राम लो मात्रा में पिलाने से दस्त साफ़ होता है। मल की गांठे निकल जाती हैं। आँतों की कमजोरी से उत्पन्न कब्ज और अर्श में तेल बहुत लाभ करता है।

सुजाक मूत्र विकार में अलसी का प्रयोग 

1. अलसी 50 ग्राम, मुलेठी 3 ग्राम, दोनों को दरदरा कूरकर डेढ़ पाव जल के साथ मिटती के बर्तन में हल्की आंच में पकायें। जब 50 ग्राम जल शेष रह जाये तो छानकर 2 ग्राम कलमी शोरा मिलाकर 2 घंटे के अंतर् से 20-20 ग्राम पिलाने से मूत्रकृच्छ में बहुत आराम मिलता है। अधिक मात्रा में बनाकर 10-15 ग्राम दिन तक ले सकते हैं।

2. इसके तेल की 4-6 बूंदे मूत्रेन्द्रिय के छिद्र में डालने से सुजाक पूय मेह में लाभ होता है।

3. अलसी और मुलेठी समभाग लेकर कूट लें। मिश्रण का 40-50 ग्राम चूर्ण मिटटी के बर्तन में डालकर उसमे 1 किलोग्राम उबलता जल डालकर ढक लें। एक घंटे बाद छानकर इसमें 25 से 30 ग्राम तक कलमी शोरा मिलाकर बोतल में रख लें। तीन घंटे के अंतर् से 25 से 30 मिलीलीटर तक इस जल का सेकं करने से 24 घंटे में ही पेशाब की जलन, पेशाब का रुक-रुक कर आना, पेशाब में खून आना, मवाद आदि बहना, सुरसुराहट होना आदि शिकायतें दूर हो जाती हैं।

4. अलसी के 10 ग्राम और मुलेठी 6 ग्राम, दोनों को खूब कुचल कर एक सेर जल मिलायें, अष्टांश क्वाथ सिद्ध करे। तीन घंटे के अंतर् से लगभग 25 ग्राम क्वाथ में 10 ग्राम मिश्री मिलाकर सेवन करने से जलन तत्काल दूर होकर मूत्र साफ़ होने लगता है।

पुल्टिस में अलसी का प्रयोग 

अलसी की पुल्टिस सब पुल्टिसों में उत्तम है। 4 भाग कुटी हुई अलसी, 10 भाग उबलते हुए पानी में डालकर धीर-धीरे मिलायें। यह पुल्टिस बहुत मोटी नहीं होनी चाहिए। लगाते समय इसके निम्न भाग पर तेल कपड़ कर लगाना चाहिए। इसके प्रयोग से सूजन व पीड़ा दूर होती है।

संधिशूल में अलसी का प्रयोग 

अलसी बीजों को ईसब गोल के साथ पीसकर लगाने से संधि शूल में लाभ होता है।

कटि शूल में अलसी का प्रयोग 

कमर दर्द में अलसी तेल को गर्म कर इसमें शुंठी चूर्ण मिलाकर मालिश करने से कमर दर्द दूर होता है।

गठिया में अलसी का प्रयोग 

अलसी के तेल की पुल्टिस गठिया की सूजन पर लगाने से लाभ होता है।

वीर्य पुष्ट में अलसी का प्रयोग 

काली मिर्च और शहद के साथ तीसी का सेवन कामोद्दीपक तथा वीर्य को गाढ़ा करने वाला होता है।

फोड़ा में अलसी का प्रयोग 

1. अलसी को जल में पीसकर उसमें थोड़ा जौ का सत्तू मिलाकर खट्टी दही के साथ फोड़े पर लेप करने से फोड़ा पक जाता है।

2. वात प्रधान फोड़े में अगर जलन और वेदना हो तो तिल और अलसी को भूनकर गाय के दूध में उबालकर, ठंडा होने पर उसी दूध में उन्हें पीसकर फोड़े पर लेप से लाभ होता है।

अग्निदग्ध में अलसी का प्रयोग 

शुद्ध अलसी तेल और चूने  का निथरा हुआ जल समभाग एकत्र कर अच्छी प्रकार घोट लें। यह श्वेत मलहम जैसा हो जाता है। अंग्रेजी में इसे   कहते हैं। इसको अग्निदग्ध स्थान पर लगाने से शीघ्र ही व्रण की पीड़ा दूर हो जाती है।  और नित्य 1 या दो बार प्रलेप करते रहने से शीघ्र ही लाभ हो जाता है।

बंद गाँठ में अलसी का प्रयोग 

अलसी के चूर्ण को दूध व जल में मिला, उसमें थोड़ा हल्दी का चूर्ण डालकर खूब पका लें और जहां तक सहन हो सके, गर्म-गर्म ही ग्रंथि व्रणों पर इस पुल्टिस का गाड़ा लेप कर ऊपर से पान का पत्ता रख कर बाँध दें। इस प्रकार कुल 7 बार बाँधने से व्रण परिपक्व हो फूट जाता है। अन्तः की जलन टीस पीड़ा आदि दूर होती है। किन्तु अन्तर्विद्रधि पर यह पुल्टिस कई दिनों तक लगारार बांधनी पड़ती है।

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