जगेश्वर प्रसाद यादव की जीवनी Jageshwar Prasad Yadav Biography in Hindi
जगेश्वर प्रसाद यादव की जीवनी: जगेश्वर प्रसाद यादव हाता, दखवापुर, प्रतापगढ़ का जन्म 21 जून 1917 को ग्राम सरांय निर्भव पोस्ट बाबागंज जनपद प्रतापगढ़ में उनके ननिहाल में हुआ था। वे अनुशाशनप्रिय, निडर, समाजसेवी, सच्चे वफादार देशप्रेमी एवं बुलंद आवाज की प्रतिभा के मालिक थे। स्वर्गीय जगेशर प्रसाद यादव की वंशावली एवं जीवन का चंद चरित्र चित्रण कुछ इस प्रकार से है :-
जगेश्वर यादव की वंशावली
वृन्दावन ……..
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सुखई - मानिकपुर
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हनुमान - बहादुरपुर
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ओरी - धौकल सिंह का पुरवा
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दुजई - भिटहा मुरैनी
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सुरजू - भिटहा मुरैनी
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जगेश्वर - मुरैनी, कर्माइन, बिजूमऊ, हाता पूरे छत्तू
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देवनारायण - हाता पूरे छत्तू त्रिबुवन - नंद नगर
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त्रिभुवन नाथ यादव नंद नगर
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दीपक यादव - कानपुर से, आगे प्रतीक्षा में.. . . . . .
| जीवनी | |
|---|---|
| वास्तविक नाम | जगेश्वर प्रसाद यादव |
| उपनाम | भिटहा, बड़कऊ, तेवारी, बाघ (The National Symbol and Animal) |
| व्यवसाय | समाजसेवी कृषक |
| शारीरिक आँकड़े और अधिक | |
| कद | 6 फुट 3 इंच या 187.5 सेंटीमीटर |
| वजन (किलोग्राम में) | 95 किलोग्राम (जवानी में) during 1955 |
| रंग | गेहुआं सांवला |
| आँखों का रंग | काला |
| बालों का रंग | सफ़ेद |
| व्यक्तिगत जीवन | |
| जन्मतिथि | 21 जून 1917 |
| स्वर्गवास | 27 जनवरी 1989 |
| जन्म स्थान | सरांय निर्भव, चेरगढ़, कुंडा, प्रतापगढ़ |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| धर्म एवम जाति | हिन्दू अहीर |
| कुल गुरु | पंडित देवनारायण महराज काशी |
| निवास स्थान | ग्राम मुरैनी पोस्ट धनगढ़ कुंडा प्रतापगढ़ 1917 से 1980 तक ग्राम हाता पूरे छत्तू पोस्ट दखवापुर प्रतापगढ़ 1980 से 27 जनवरी 1989 तक |
| शिक्षा | शिक्षा सिर्फ गुड तक पढ़ाई यानी चार जीरो लिखकर पहले जीरो के दाहिनी तरफ मिलाकर नीचे की तरफ हल्के बाएं झुकी एक लाइन एवम चौथे जीरो के दाहिनी तरफ मिलाकर ऊपर की तरफ एक लाइन खींचने से good बनता है, उनके कहने का मकसद यही था कि किसी भी कार्य को अच्छा बनाने के लिए बहुत कठिन परिश्रम की आवस्यकता नहीं होती, सिर्फ लगन एवम करने की इच्छा शक्ति प्रबल होनी चाहिए जैसे अंग्रेजी में गुड "good " बनाने में बहुत सीखने की आवश्यकता नहीं है। |
| परिवार | |
| माता/पिता | पिता: स्वर्गीय श्री सुरजू यादव माता: स्वर्गीय गुलाबी देवी |
| पत्नी | स्वर्गीय श्रीमती राम कली देवी |
| भाई | स्वर्गीय श्री राम लाल यादव श्री राम सुन्दर यादव |
| बहन | महरानी देवी फुलझड़ी देवी |
| पुत्र | श्री देव नारायण यादव श्री राम सुमेर यादव श्री राजा राम यादव श्री सत्य नारायण यादव सूबेदार मेजर शिव नारायण यादव |
| पुत्री | श्रीमती जगपती देवी पत्नी राम नाथ यादव करेंटी कुंडा |
| पौत्र एवं पौत्रियां | श्री देव नारायण के पुत्र: त्रिभुवन नाथ यादव मुख्य तकनीशियन क्रिलोस्कऱ कंपनी उ. प्र. अर्जुन सिंह यादव कृषक अरुण कुमार यादव - बिजली के सजावट कर्ता शैलेन्द्र यादव - फोटोग्राफर श्री राम सुमेर यादव की बेटियां:- श्रीमती उर्मिला देवी, शुशीला देवी, धनपत देवी, माधुरी देवी, आशा देवी, शोभा देवी एवं सीमा देवी। श्री राजा राम यादव के बेटे एवं बेटियां : सूरज यादव, राहुल यादव - विद्यार्थी श्रीमती निशा देवी, उषा देवी एवं कुमारी शांती देवी श्री सत्य नारायण यादव के बेटे सुरेंद्र कुमार यादव -बिजली के सजावट कर्ता एवं बेटी निर्मल देवी। सूबेदार मेजर शिव नारायण यादव के पुत्र व् पुत्री : मेजर सुरेंद्र यादव - अधिकारी भारतीय सेना पत्नी श्रीमती सुनीता देवी एम्एससी, बीएड गोल्ड मैडलिस्ट जयपुर यूनिवरसिटी। निलेश यादव - बायोटेक इंजीनियर एंड एमबीए - मैनेजिंग डायरेक्टर ऑफ़ आई टी कंपनी। कुमारी ममता यादव - मैनेजर ऑफ़ आई टी कंपनी। |
| जीवन के आदर्श | श्री भगवती प्रसाद यादव महात्मा गाँधी सुभाष चंद्र बोष |
| शौक | घुड़सवारी |
| देश विदेश भ्रमण | लाहौर, रंगून, जबलपुर, इंदौर, देहरादून, पिथौरागढ़ |
| अंग्रेजी सेवा | इन्डियन मिलिट्री अकादेमी देहरादून 1935 से 1941 तक |
| समाज सेवा | समाज में ब्याप्त कुरीतियां, अन्धविश्वास, अशिक्षा, बेरोजगारी के प्रति जागरूकता पैदा करना |
- मात्र 12 वर्ष की आयु में स्व. जगेसर प्रसाद यादव को 14 नवम्बर 1929 को राष्ट्रपिता महत्मा गाँधी से मिलने का सौभाग्य कालाकांकर प्रतापगढ़ में प्राप्त हुआ जहाँ पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल बजा और अंग्रेजी वस्त्रों की होली जलाने के सहभागी बने।
- ब्रिटिश सेना में पहली बार 40 भारतीय सैनिक अधिकारियों की पासिंग आउट परेड देखने के लिए इंडियन मिलिट्री अकादमी देहरादून गए तो परिवार की आर्थिक स्थित अच्छी न होने के कारण वहीँ नोकरी कर ली, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत उन्हें रास नहीं आई एवं द्वतीय विश्व युद्ध के पहले 1941 नॉकरी छोड़कर भगवती प्रसाद यादव एवम गोविन्द सिंह यादव के संपर्क में आकर स्वतंत्रता संग्राम में सामिल हो गए।
- स्वर्गीय भगवती प्रसाद यादव ब्रिटिश आर्मी में इलेक्ट्रिकल मकैनिकल इंजीनियर पद पर भोपाल में तैनात थे, उन्होंने भी सुभाष चंद्र बोश के संपर्क में आकर ब्रिटिश सेना सन 1941 में छोड़ दी थी।
- गोविन्द सिंह यादव उन्ही के करीबी थे जो कि ब्रिटिश एयर फाॅर्स में सार्जेंट थे, उन्होंने भी ब्रिटिश एयर फाॅर्स छोड़ दी थी।
- 1942 में उनके उत्तम चरित्र, साहस एवं समाजसेवा को मध्यनजर रखते हुए दुजई एवं महादेव उर्फ़ तेवारी ने उन्हें करमाइन, हनुमानपुर हाता, पूरे छत्तू बुला लिया उनके दोनों भाई के बीच कोई पुत्र नहीं था सिर्फ पुत्रियां थी लेकिन उन दोनों भाइयों ने बाद में अपनी सारी संपत्ति श्री जगेसर यादव के नाम कर दी।
- महादेव यादव के स्वर्गवास के पश्चात सन 1976 में श्री जगेसर प्रसाद ने सारी संपत्ति को अपने तीनो भाइयों में बराबर बाट दी थी जो की 1956 से अलग रह रहे थे। अलग रहते हुए भी तीनो भाइयों में अगाध प्रेम था खेती इकठ्ठा होती थी और शाशन सिर्फ बड़े भाई का ही चलता था, दोनों छोटे भाइयों ने कभी बड़े भाई से कोई प्रश्न नहीं किया सिर्फ सैनिक शाशन था जहॉं जूनियर को सोचने एवं बोलने के इजाजत नहीं होती।
- 1945 में उनके गौना के 10 वर्ष लंबे इंतजार के पश्चात् श्रीमती राम कली देवी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिससे भिटहा परिवार में खुसी की लहार दौड़ गयी।
- 1947 के प्रारम्भ में वे नौकरी की तलास में जगन्नाथ पाल के साथ लाहौर गए किन्तु देश के बटवारे से पहले हिन्दू मुस्लिम दंगे भड़क उठे और उन्हें कुछ ही दिनों में मुश्किल से वापिस आना पड़ा।
- सुरजू यादव एवं जगेसर प्रसाद सहित परिवार की खुशियों का ठिकाना न रहा उन्होंने ने काशी से अपने कुलगुरु को बुलाकर नामकरण कराया। कुलगुरु ने भी हर्ष से बालक का नामकरण अपने ही नाम पर “देव नारायण” रख दिया।
- 1950 में पंडित भद्रकाली दीन शुक्ल के संपर्क में आकर उन्होंने आजाद भारत के बाबागंज सहकारी समिति के प्रथम सदस्य होने का गौरव प्राप्त किया।
- 1958 में उनके मौसा श्री दुजई यादव का 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
- 1962 में उनकी पत्नी राम कली का अचानक निधन हो गया उनके ऊपर मुसीबतो का पहाड़ टूट पड़ा घर को सँभालनेवाला कोई नहीं था पूरी की पूरी गृहस्थी छिन्न भिन्न हो गयी बच्चो की शादी, विवाह, गौना, थौना, पढ़ाई लिखाई, दान दहेज़ के खर्चों ने आर्धिक रूप से कमर तोड़ दी यहाँ तक की उनके तीन बेटे 1973 तक अलग हो चुके थे।
- 13 जून 1972 को दोपहर एक बजे श्री महादेव ‘तेवारी’ ने श्री रामसुख यादव, भोला यादव एवम पुतुनू के द्वारा दूध पिलाने के बाद बातें करते करते नीम के बृक्ष के नीचे बड़े आराम से परिवार को आशीष देते हुए इस महापुरुष ने अंतिम बिदाई ली।
- यहाँ तक कि 1974 में कर्ज में दब जाने के कारण बृद्धा अवस्था में उन्हें मजदूरी करने पिथौरागढ़ जाना पड़ा था।
- 14 जनवरी 1973 को घर में आग लग जाने से सम्पूर्ण गृहस्ती जल कर खाक हो गयी जिससे बहु बड़ा आर्थिक झटका लगा।
- 10 अप्रैल १९७८ को उनके जेष्ट पोते बंशी लाल का अचानक निधन हो गया।
- 11 जुलाई 1978 को लंबी बीमारी के उपरांत एवम पुत्र शोक में उनकी सबसे अच्छी बहू श्रीमती राज कली देवी पुत्री श्री महराजदीन का निधन को हो गया इस प्रकार परिस्थितियों ने उन्हें पूरी तरह कमजोर कर दिया।
- 1980 से परिस्थितयों में सुधार हुआ एवम धीरे धीरे सब सामान्य हो गया किन्तु 1985 से उनका स्वास्थ कमर एवं रीढ़ की हड्डी के दर्द के कारण ख़राब होने लगा।
- 1986 से 1988 तक उनका इलाज भारत वर्ष की जानी मानी अस्पताल महाराजा यशवंत राव हॉस्पिटल इंदौर, सैनिक अस्पताल इलाहबाद, सैनिक हॉस्पिटल महू एवं प्रसिद्द डा. चारा नरसिंग होम इंदौर में हुआ लेकिन उनके स्वास्थ में कोई सुधार नहीं हुआ।
- इन दिनों में उनके पूरे परिवार ने पूरा सहयोग दिया विशेष कर उनके सबसे बड़े नाती त्रिभुवन नाथ की सेवाये स्मरणीय रहेंगी।
- 26 जनवरी 1989 को उनके प्रिय छोटे बेटे सेना से 3 दिन अकाश्मिक का अवकाश लेकर पिता से मिलने अचानक आये थे। रात 10.30 बजे उन्होंने अपने छोटे पुत्र को आवाज देकर पास बुलाया और बोले की अब हमारा अंतिम समय आ गया है, आओ कुछ बातें करनी है..
- बेटे से उन्होंने बहुत सारी बातों की साथ में कुछ गुप्त धन की भी जानकारी दी जिसको उन्होंने भी कभी नहीं देखा था लेकिन सायद यह उनकी स्वर्गीय पत्नी की धरोहर थी, बेटे ने कहा कि “काका हमका धन दौलत न चाही तू भले होइ जा बस” और साथ में यह सोचा की पिता जी का अंतिम समय आ गया है इस लिए यह कुछ बड़बड़ा रहे हैं, किन्तु ऐसा नहीं था उनकी बातो में सच्चाई थी। बहुत सारी बातें करते समय उन्होंने अपना सिर बेटे की गोद में रखा था और छाती की मालिस करा रहे थे क्योंकि छाती में तीब्रगति से उठे दर्द से कराह रहे थे साथ साथ बार बार हाथ उठाकर सुखी रहने एवम पदोन्नति होने का आशीर्वाद दे रहे थे। धीरे धीरे उनकी आवाज घरघराने लगी थी। बहार से किसी महिला की आवाज आई की “तू उनका छोड़ के चला आवा नाही तौ तुं हूँ का सनपात छुइ लेई” बाते सुनकर उनके बेटे को बहुत बुरा लगा था। इस घटना क्रम के साक्षी श्री बाबूलाल यादव उनके उनके प्रिय बहन के दामाद आज भी है जिनका बगल में ही बिस्तर था, जो सब कुछ देख और सुन रहे थे।
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अंततः 27 जनवरी 1989 के प्रारंभिक पहर में लगभग पौने एक बजे घर के काफी लोग इकठ्ठा हो गए थे, उनके बड़े बेटे गंगा जल की ब्यवस्था के लिए चले गए और छोटे बेटे उनके स्वर्ग में सर्बोच्च स्थान के लिए महाकाल को प्रसन्न करने के लिए मन्त्र लगातार अंतिम समय तक पढ़ते रहे ……………….
- बडकऊ को चदैनी के गीत बहुत पसंद थे जो कि 11वीं सदी के महाराजा लोरिक यादव और चंदा की अमर प्रेम कथा से संबंधित है, (जो कि इतिहास के अनुसार छत्तीसगढ़ एवं रीवा के राजा थे) जिनकी दो ही पंक्तिया याद है जो इस प्रकार से हैं.
- मनुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान।
भीलन लूटी गोपिका, वहि अर्जुन वही बान।।
- इन दो पंक्तियों मे ही उन्होने पूरी कायनात के गुप्त रहस्य से पर्दा उठा दिया है यदि कोई समझ सके तो ?
- यदि किसी को चदैनी के गीत के बारे मे कुछ अधिक जानकारी हो तो कृपया कॉमेंट बॉक्स मे ज़रूर लिखें.
- पूरे भिटहा परिवार के साथ उनके पुत्र राम सुमेर एवं नाती त्रिभुवन, परपोती रागिनी को स्वर्गीय जगेश्वर प्रसाद यादव के बारे में चंद शब्द लिखने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए लेखक का धन्यवाद !
- पाठकों से अनुरोध है कि किसी प्रकार के सुझाव के लिए किसी भी भाषा में अपना विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें क्योंकि लिखने के लिए ये तो चंद शब्द हैं, बाकी तो पूरा इतिहास शेष पड़ा है, धन्यवाद।
- उपरोक्त जानकारी पुराने दस्तावेजों के आधार पर एवं सैनिक डायरी से सम्लित की गयी है जिसे बनाने में स्व. भगवती प्रसाद यादव का बहुत बड़ा योगदान है।
मेरा भारत महान I LOVE MY INDIA




